गठिया रोग क्यों होता है? | गठिया रोग के प्रकार एवं घरेलु इलाज

गठिया, ग्रंथिवात या अंग्रेजी में ‘गाउट' एक ही रोग के अलग-अलग नाम हैं। गठिया रोग पैरों से, विशेषत: पैर में अंगूठे से आरंभ होता है। और धीरे-धीरे बढ़कर शरीर के अन्य छोटे-छोटे जोड़ों या गांठों में फैल जाता है।

गठिया रोग क्यों होता है? | Why does Arthritis

स्वस्थ स्त्रियों का रक्त क्षार-प्रधान होता है, परन्तु रक्त की यह क्षार-प्रधानता तभी कायम रह सकती है जब हमारा भोजन क्षार-प्रधान हो। किन्तु बहूत लोग असंतुलित भोजन करते हैं और उनके भोजन में अम्ल कारक खोद्यान्न-जैसे पालिश किया हुआ चावल, चोकर निकला हुआ आटा, सफेद चीनी, दालें, तली-भुनी चीज, चाट-चटनी, अचार, खटाई, मिर्च-मसाले तथा मांस-अंडा आदि की अधिकता रहती है, और क्षार पैदा करने वाले खाद्य-फल और तरकारी आदि की मात्रा आधे से भी कम हो जाती है।

ऐसी अवस्था में अम्लता शरीर की अस्थियों की ओर विशेषतया जोड़ों की ओर आकर्षित होती है। क्योंकि अस्थियां मुख्यत: चूने (कैल्शियम) की बनी होती है, जो क्षार है। पर अस्थियों से क्षार अलग तो हो नहीं पाते, अत: यह अम्लता अस्थियों पर चिपक जाता है। इससे जोड़ों के हिलने में दर्द एवं कठिनाई होती है और इस तकलीफ को ही गठिया कहा जाता है।

गठिया रोग के प्रकार | Types of arthritis

गठिया कई प्रकार का होता है। किसी में शरीर के कुछ जोड़ों में कभी-कभी ही दर्द होता है, किसी में कुछ खास-खास जोड़ों में दर्द होता है। किसी में कुछ खास-जोड़ों में बराबर दर्द बना रहता है। किसी गठिया में दर्द एक जोड़ से दूसरे और दूसरे से तीसरे में दौड़ता हुआ प्रतीत होता है। और कोई गठिया तो ऐसा दु:खदायी होता है कि रोगी चारपाई से उठ ही नहीं सकता। ऐसे गठिया को अंग्रेजी में रद्द गूमेटाइड आर्थराइटिस' कहते हैं।

गठिया से आक्रांत स्थान पर सूजन और दर्द होता है। तथा कभी-कभी वह स्थान गर्म और लाल भी होता है और उसे छूने या हिलाने से तकलीफ बढ़ जाती है।

गठिया में रात्रि के बाद यानी सूर्योदय से थोड़ा पहले रोगी अधिक तकलीफ महसूस करता है। उस वक्त सोते हुए रोगी की नींद गठिया की तकलीफ से प्रायः टूट जाती है। गठिया के साथ अक्सर ज्वर भी होता है, जो प्रायः 102 डिग्री से आगे नहीं बढ़ता है। रोग को बढ़ी हुई दशा में रोगी को कब्ज, सिर दर्द, स्नायविक उत्ते चिड़चिड़ापन, अस्थिरता, अधीरता, तृषा, तथा मूत्रदोष आदि उपसर्ग रोग अधिक सताते है।

गठिया रोग में घरेलु इलाज | Home remedies in arthritis

1। आधे घंटे तक सिर, चेहरे और रोग वाले स्थान को केले की हरी पत्तियों से सेंक कर नंगे बदन घूप में बैठना चाहिए। उसके बाद ठंडे पानी से भीगे और निचोड़े तौलिये से समूचे शरीर को पोंछ डालना चाहिए या ठंडे पानी से नहा लेना चाहिए। सप्ताह में तीन बार ऐसा करना चाहिए।

2। गठिया वाले अंश को दिन में तीन बार आधे घंटे तक गर्म जल में डुबोकर रखने या उस पर भाप देने के बाद, उस पर ठंडे जल में भीगे और निचोड़े हुए कपड़े की पट्टी रखनी चाहिए। पट्टी के गर्म हो जाने पर उसे थोड़ी थोड़ी देर में बदलते रहना चाहिए।

3। गठिया के रोगी को जल प्रचुर मात्रा में पीना चाहिए। सुबह-शाम गर्म पानी में कागजी नींबू का रस निचोड़कर जरूर पीना चाहिए। गठिया के रोगी को दूध के साथ किशमिश का प्रयोग करने से बड़ा लाभ होता है।

4। पुराने गठिया में 14 दिनों तक फलों के रस पर रहने और रोज एनिमा लेने के बाद सुबह 10 मिनट का उदर-स्नान और शाम को 7 मिनट मेहन-स्नान कर लेना चाहिए तथा कब्ज दूर होने तक रोज गर्म जल का एनिमा लेना चाहिये। साथ ही हर तीसरे दिन एप्समसाल्ट-बाथ लेना चाहिए दोपहर को ठंडा-स्पंज-बाथ तथा घर्षणस्नान करना चाहिए।

5।

रोगी को अपने शारीरिक बल के अनुसार कुछ दिनों तक दोनों वक्त एनिमा लेकर उपवास करना चाहिए, फिर कुछ दिनों तक केवल फलों के रस पर रहना चाहिए और एनिमा जारी रखना चाहिए। तत्पश्चात् कुछ दिनों तक केवल फल खाकर रहने के बाद धीरे-धीरे सादे और साधारण भोजन पर आना चाहिए।

एनिमा लेने के फायदे | Benefits of taking anima

किसी तख्ते या कड़ी खाट पर उसके पैताने को सिराहने से 4 इंच ऊंचा रखकर और पैरों का उकडू खींचे हुए चित्त लेटकर एनिमा लेना चाहिए। एनिमा के बर्तन को लेटने की जगह से 4 फुट की ऊंचाई पर दीवार में एक कील गाड़कर टांगना चाहिए। और उसमें (बालिगों के लिए) लगभग ढाई सेर गुनगुना पानी भरना चाहिए। टोंटी को खोलकर थोड़ा पानी निकाल देना चाहिए। फिर गुदा में डालने वाली नली पर चिकनाई चुपड़ देनी चाहिए।

तब उसे गुदा-मार्ग में धीरे से एक इंच तक प्रवेश कराकर भीतर पानी जाने देना चाहिए। भीतर पानी जाते समय पेडू को धीरे-धीरे बायें से दायें को मलना चाहिए और जब सब पानी अंदर जा चुके, तो नली को निकालकर और थोड़ी देर रुककर उसी प्रकार पेडू को दायें से बायें मलना चाहिए फिर शौच जाना चाहिए।

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