किडनी में दर्द होने का कारण और किडनी के दर्द में आयुर्वेदिक व घरेलु इलाज

जब तक पथरी गुर्दे में पड़ी रहती है तब तक कुछ कष्ट नहीं देती है, परंतु जब बाहर निकलने लगती है तब असहनीय दर्द होता है, उसी को गुर्दे का दर्द या वृक्कशूल कहते हैं। नाचने, कूदने या जोर से हिलने पर अथवा बिना किसी विशेष कारण के पथरी का दर्द शुरू हो जाता है। दर्द के साथ या उसके बाद मूत्र में रक्त एवं एलव्यूमिन कुछ दिनों तक आती रहती है।

पथरी के कारण किडनी में दो प्रकार के लक्षण उत्पन्न होते हैं:

(1) यदि अपने स्थान से हिलकर पथरी मूत्र नलियों द्वारा नीचे उतरती है तो तेज दर्द, मूत्र में खून का आना या मूत्र का बिलकुल न आना आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं।

(2) पथरी अगर गुर्दे में एक जगह पड़ी रहे तो कभी-कभी वह स्थान घावयुक्त हो जाता है।

अचानक गुर्दे में दर्द आरंभ हो जाता है, दर्द वहां से पीछे नितंब प्रदेश की ओर जाता हुआ लगता है। दर्द इतना तेज होता है कि रोगी बेचैन होकर लोट-पोट होता रहता है, उल्टी के साथ पसीने भी आने लगते हैं। कभी-कभी बुखार हो जाता है। जब तक पथरी मूत्र नलियों में से निकलकर मूत्राशय में नहीं आ जाती दर्द होता ही रहता है। मूत्र-प्रणाली का वह भाग जहां से गुर्दे से बाहर आती है तंग होता है, यहीं आकर पथरी अटक जाती है। दर्द शुरू हो जाता है।

जब पथरी यहां से सरक जाती है तो बिना किसी दर्द के मूत्र-प्रणाली द्वारा मूत्राशय में आ जाती है। जब तक पथरी स्थायी रूप से न अटक जाए या घाव पैदा न कर दें तो उस ओर के गुर्दे में सूजन होकर धीरे-धीरे गुर्दा बेकार हो जाता है।

गुर्दे का दर्द पथरी के कारण ही होता है। यदि मूत्र में किंचित रक्त भी हो तो पथरी समझनी चाहिए। एक्सरे द्वारा आक्जलेट की पथरी स्पष्ट प्रतीत होती है, यूरेटस की कम तथा फास्फेट की पथरी बहुत कम दिखाई देती है।

किडनी के दर्द में घरेलु इलाज

गुर्दे की पथरी में विशेषतः पेशाब लाने वाली औषधियां हितकर होती हैं। महर्षि आत्रेय का मत है कि उत्तम शराब पीकर तेज सवारी से ऊंची-नीची जमीन पर दौड़े। कुल्थी की दाल, लौकी, खीरा, ककड़ी, पका सफेद पेठा, नारियल का जल सेवन से लाभ होता है। कुल्थी का क्वाथ या जल विशेष लाभकारी होता है।

1. हजरुल यहूद भस्म (बदर पाषाण भस्म) 500 मि.ग्राम वरुणाद्यलौह 500 मि.ग्राम, यवक्षार, नारियल के फल दो ग्राम दिन में तीन-चार बार वरुणादि क्वाथ के साथ दें।

2. आनंद योग (तिल क्षारादि) 500 मि.ग्राम कुल्थी के क्वाथ दो बार दें।

3. वातज में त्रिविक्रम रस 240 मि.ग्राम व आनंद योग, विजोरे नींबू की जड़ का चूर्ण मिलाकर वरुणादि क्वाथ से तथा पाषाण भेदाद्य धृत 10 मि.ग्राम गोखरू के क्वाथ दें।

4. पित्तज में पाषाण बज्ररस 240 मि.ग्राम श्वेतपर्पटी 2 ग्राम मिलाकर एलादि क्वाथ से तथा कुशाध घृत 10 मि.ग्राम गो दुग्ध में मिलाकर पिलाएं। सरपत की जड़ 10 ग्राम खारी नमक 10 ग्राम मिट्टी के पात्र में बना हिम पिलाएं।

5. कफज में पाषाण भिन्न रस 240 मि.ग्राम, त्रुटयादि चूर्ण 3 ग्राम मिलाकर गुंठ्यादि क्वाथ से तथा वरुणाद्य घृत 10 मि.ग्राम कुल्थी के क्वाथ में मिलाकर पिलाएं।

6. चंद्रप्रभा के साथ पुनर्नवासव दें।

7. शुक्राश्मरी में पाषाण भिन्न रस में शुद्ध शिलाजातु 500 मि.ग्राम मिलाकर दें। वरुणावद्य घृत 10 ग्राम को गोखरू के क्वाथ से दें।

8. पाषाणभेद, शतावर, श्वेतकुष्मांड रस, अपामार्गक्षार, पलाश क्षार, सिस्टोन टेव, कैलक्यूरी टेब, नीरी। टेबलेट तथा नीरी सीरप आदि उत्तम पथरी भेदक योग हैं। इन्हें लगातार सेवन कराएं।

लाभ:- मूत्राशय के रोगों में मूत्रल शीत वीर्य द्रव्यों का प्रयोग करें। पुराने अन्न, जांगल, खीरा, ककड़ी, लौकी, परवल, आंवला, गाय का दूध, छाछ, नारियल का पानी, पुरानी शराब, ईख का रस आदि लाभकर हैं।

नुकसान:- मूत्रकृच्छ, मूत्राघात, पथरी में रुखे, तीक्ष्ण, कसैले पदार्थ हानिकर हैं। जामुन, कैथ आदि, अम्ल पदार्थ, श्रम, मैथुन इन रोगों में हानिकर हैं।

(और पढ़े: पथरी रोग क्या है)

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